गुरु पूर्णिमा

 
गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर विश्व के सभी गुरुओं का हार्दिक अभिनंदन व शत्-शत् नमन l
हिन्दू धर्म के अनुसार आषाढ़ माह की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता हैl गुरु पूर्णिमा, गुरु के प्रति श्रद्धा व समर्पण का पर्व है
    हमारे जीवन के प्रथम गुरु हमारे माता-पिता होते हैं। जो हमारा पालन-पोषण करते हैंl सांसारिक दुनिया में हमें प्रथम बार बोलना, चलना तथा शुरुवाती आवश्यकताओं की पूर्ति करते है l अतः माता-पिता का स्थान सर्वोपरी है। जीवन का विकास सुचारू रूप से सतत् चलता रहे उसके लिये हमें 'गुरु' की आवश्यकता होती है। जीवन का निर्माण गुरू द्वारा ही संभव हो पाता है l 
           'गु' का अर्थ अंधकार(अज्ञान) व 'रु' का अर्थ प्रकाश(ज्ञान) होता है l 'गुरु' जहां एक ओर ज्ञान रूपी प्रकाश से अपने शिष्यों को प्रकाशित करता है, वहीं दूसरी ओर अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर हमेशा सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता रहता है l धर्मों में गुरु को ईश्वर तक पहुंचने का एक सरल मार्ग बताया गया है, उनके अभाव में परमेश्वर को महसूस करना बेहद मुश्किल है l हालांकि गुरु सच्चा व निष्काम की भावना से ओत-प्रोत होना चाहिएl
     
         गुरु महिमा को शब्दों में ब्यक्त कर पाना संभव नहीं है l संत कबीर ने निम्न पंक्तियों के द्वारा गुरु महिमा की व्याख्या करने का प्रयास किया है –

सब धरती कागज करू, लेखनी सब वनराज।

सात समुंद्र की मसि करु, गुरु गुण लिखा न जाए।।

गुरु की महिमा  बताना तो सूरज को दीपक दिखाने के समान हैl गुरु पूजनीय, आदरणीय व वंदनीय है l

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