मन का भटकाव

ऐ मन तू ऐसा भटकता क्यों है?
क्या चाहिए तुझे, ऐसा अखरता क्यों है?
चाहतें कभी पूरी नहीं होती,
बल्कि दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जाती है,
अब तू संभल, ऐसा भटकना बंद कर। 

माना एक दिन तुझे मिल जाये सब कुछ
भटकते हुए इस मन पर काबू हो जाये सब कुछ,
क्या उस दिन तू अपनी ख्वाहिशें पूरी हुई मानेगा
अथवा यह भटकाव आगे भी ऐसा ही बढ़ता जायेगा?
इसीलिए कहता हूं, जरा संभल, अब भटकना बंद कर। 

याद रख इस दुनिया में कुछ भी शाश्वत नहीं है,
वर्तमान में जो दृश्य व अच्छे कर्म है, वही शाश्वत है यहां
फिर कल्पना से परे तू सोच मत,
प्यारे जरा संभल, अब तू भटकना बंद कर। 

माना भटकते-भटकते ही सही, तुझे राहें पाना पसंद है
भरोसा है कि एक दिन तुझे वास्तविक लक्ष्य भी मिलेगा,
जरा संभल, जरा संभल, अब तू भटकना बंद कर।  


जरा अतीत के उन झरोखों को याद कर,
कभी प्लेग तो कभी हैजा महामारी से ग्रसित थी ये दुनिया,
आज कोरोना का कहर है।  
याद रख जैसे प्लेग, हैजा से, इस दुनिया को मुक्ति मिली,
वैसे ही कोरोना का अंत होना भी सुनिश्चित है।  
बस तू धैर्य रख, न डर,
जरा संभल, जरा संभल, अब तू भटकना बंद कर।  

धीरे-धीरे ही मिलता है, इस जहां में सब कुछ,
माना बिना कोशिश किये जय-जय कार नहीं होती।  
तेरा विश्वास, तेरी कोशिश एक दिन जरूर रंग लायेगी,
अपना सुनहरा इतिहास खुद बनाएगी। 
जरा संभल, जरा संभल, अब तू भटकना बंद कर।  

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21 टिप्पणियाँ

  1. उत्तर
    1. सही कहा है आपने परमार जीl साथ ही कहना चाहूंगा कि यदि विद्यार्थी जीवन में निरंतर अपने लक्ष्य की तरफ गतिमान होने के साथ-साथ योग, meditation को भी अपनाया जाये तो निश्चित रूप से छात्र जीवन में आने वाले भटकाव को कम किया जा सकता है l

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  2. बहुत शानदार पंक्तियां है भुला मानव ह्रदय होता ही चंचल है जिसने इस पर काबू पा लिया उसे अपने लक्ष्य से कोई नही भटका सकता है ।

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  3. Aashish tum itne ache kavi ho pta nhi tha...waise bhut achi lines hain...keep it up.👍

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  4. Ashish Bhai Hum to school time se hi apke sath apki partibha ko jante hai..

    Bahut sundar pankti likhi apne.

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